Monday, December 3, 2018
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Exclusive: नक्सली, सियासत और शिक्षाकर्मी

रायपुर(मनोज कुमार साहू)। नक्सलवाद से बुरी तरह ग्रसित छत्तीसगढ़ में सियासत हमेशा से नक्सलियों के निशाने पर रहा है पर प्रदेश में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी शिक्षाकर्मी नेता को कथित तौर पर नक्सलियों ने धमकी भरा पत्र भेजा है और शिक्षाकर्मियों के 22 वर्षों से चले आ रहे संविलियन की मांग के पूरा न होने पर शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे को भी मुख्यमंत्री समेत अन्य नेताओं के साथ जान से मार देने की धमकी दी गई है और यह पत्र सरकार के किसी बड़े नेता को नहीं बल्कि शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे को आया है और वह भी उनके स्कूल के पते पर, जिसके बाद से ही यह सवाल उठने लगा है की शिक्षाकर्मियों के मुद्दे को लेकर हमेशा समर्थन देने वाले नक्सलियों ने आखिरकार शिक्षाकर्मी नेता को जान से मारने की क्यों धमकी दी क्योंकि संविलियन ना होने की स्थिति में सरकार का दोषी होना तो समझ में आता है पर शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे का संविलियन न मिलने की स्थिति में क्या दोष हो सकता है यह समझ से परे है तो क्या पत्र लिखने वाले तथाकथित नक्सली वीरेंद्र दुबे को भी सरकार के साथ दोषी मान रहे हैं या फिर किसी ने नक्सलियों की आड़ में कोई और चाल चली है।

पूरे मामले में है कई पेंच

इस पूरे मामले में ध्यान से देखें तो इसमे कई पेंच है जैसे (1) आमतौर पर नक्सली अपनी कोई भी बात या किसी भी प्रकार की कोई धमकी पर्चा फेंककर देते हैं और फिर लोकल मीडिया के माध्यम से खबर प्रदेश में फैलती है लेकिन इस मामले में शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे के स्कूल के पते पर डाक के जरिए पत्र भेजा गया है साथ ही किसी और को ना खोलने की ताकीद की गई है इसका सीधा सा मतलब है कि पत्र भेजने वाला यह नहीं चाहता था कि कोई अन्य इस पत्र को देख सके जबकि नक्सली जब भी किसी को धमकी देते हैं तो वह चाहते हैं कि इसका अधिक से अधिक प्रचार प्रसार हो ताकि प्रदेश में उनका खौफ बना रहे।

 

(2) नक्सली आमतौर पर हस्तलिखित पर्चा या पत्र ही जारी करते हैं जबकि शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे को जो पत्र जारी हुआ है उसका जो लिफाफा मीडिया के सामने आया है उसमें नाम और पता टाइप करके लिखा गया है न कि हाथों से, जो नक्सलियों के द्वारा जारी पत्र के स्टाइल से जरा भी मैच नहीं खाता।

(3) नक्सली आमतौर पर कभी भी शिक्षकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि यह देखने को मिला है कि नक्सली शिक्षाकर्मियों के हितों के समर्थन में कई बार पत्र जारी कर चुके हैं ऐसी स्थिति में एक शिक्षाकर्मी नेता के लिए इस प्रकार की धमकी जारी किया जाना नक्सलियों के ट्रेंड से मैच नहीं करता , वह भी तब जब वीरेंद्र दुबे स्वयं शिक्षाकर्मियों की लड़ाई में शामिल है और अभी कुछ दिनों पहले ही जंगी प्रदर्शन करने वाले शिक्षाकर्मी मोर्चा के पांच प्रदेश संचालकों में से एक हैं ।

(4) हालांकि संवेदनशील मामला बताते हुए शिक्षाकर्मी नेता वीरेंद्र दुबे ने पत्र को सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन खुद से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी किया है जिसमें उन्होंने पूरे मामले का खुलासा किया है और मुख्यमंत्री समेत 10 भाजपा नेताओं के साथ साथ खुद को नक्सलियों से खतरा बताया है और इस पूरे मामले से गृहमंत्री रामसेवक पैकरा को अवगत कराने की बात बताई है चूंकि पत्र सार्वजनिक नही किया गया है इसलिए खत के अंदर की पूरी बात तो सामने नही आ सकी है पर इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी गृहमंत्री के पास शिकायत करने गए  शिक्षाकर्मी नेता के साथियों के द्वारा इस मामले को लेकर बिल्कुल भी संवेदनशीलता नही बरती जा रही है बल्कि गृहमंत्री रामसेवक पैकरा के साथ मुलाकात के फोटो के साथ इस खबर को भुनाने का प्रयास करते हुए सोशल मीडिया में लगातार  मैसेज किया जा रहा है जो कि समझ से परे है।

अब देखना होगा कि गृहमंत्री के संज्ञान में आने के बाद कथित तौर पर नक्सलियों के द्वारा जारी इस पत्र की जांच में क्या निकलकर सामने आता है या फिर स्वयं नक्सली सामने आकर इस पत्र का खंडन करते हैं क्योंकि आमतौर पर देखा गया है कि जब कभी नक्सलियों के नाम से झूठे पत्र जारी किए जाते हैं तो नक्सली स्वयं इसका खंडन करते हैं । अब यह जांच के बाद ही पता चल पाएगा कि पत्र स्वयं नक्सलियों ने जारी किया है या फिर यह किसी की शरारत या चालबाजी है, जरूरत है इस बात की इस पत्र की गंभीरता से जांच की जाए और दूध का दूध और पानी का पानी किया जाए।

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